সৎনামী

অসমীয়া ৱিকিপিডিয়াৰ পৰা
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[1][1]" [[:চিত্ৰ:|thumb|right|200px|]]]] सतनाम धमम " कोई आज का जन्मा पंथ नही है सतनाम को धारण करने वाले आज भी इसके साक्षी हैं , सतनाम ककसी धमम ग्रंथ, वेद , पुराण के आधार पर सूचारू व गततमान नही है ! सतनाम एक स्वतंत्र ववचारधारा और जीवनशैली से पररपूणम व मानवतावाद पर आधाररत, कमम पर केन्रीत धमम है | माना जाता है जब सृष्टि का ववस्तार हुआ तो सत्य से हुआ और सत्य दो धातुओं से ममलकर बना है सत् और तत् , सत् व तत् गुण के संयोग से ही सारी सृष्टि सृष्जत हुई , सत् का अथम यह और तत् का अथम वह , तथा ये दोनो ही सत्य हैं जो तत् सदा, सवमदा, तनलेप, तनववमकार व तनराकार और सदैव स्वरूप में ष्स्थत रहता है उसे सत्य ही कहते हैं जड़, प्राण, आत्मा सत्य की श्रेणी में आते हैं ष्जस तत्वों से सारी सृष्टि का तनमामण हुआ वे पांच तत्व ( आकाश, वायु, जल, अष्नन,भूमम ) है जो की इस सृष्टि में सास्वत सत्य है और सतनाम धमम उसी सत्य को ष्स्वकारता है | इस सृष्टि के तनमामण के साथ ही सत्य धमम का तनमामण हुआ सृष्टि में जीववत समस्त प्राणण सत्य का प्रततक है ष्जतने भी धमम है सभी ने सत्य को ष्स्वकारा है और सत्य की अराधना भी करते हैं "सतनाम धमम " आदद काल से है प्रारंभ में सत्य को धारण करने वाले सत्यवंशी कहाये जो कक सत्यवंशी सतनामी थे , कुछ काल पश्चात् सत्यवंशी सूयमवंशी के नाम से पहचाने गये , किर कुछ काल पश्चात् चंरवंशी तथा समय चक्र के पररवतमन के साथ नाम मे पररवतमन होकर किर साध सतनामी के नाम से प्रमसध्द हुए जो कक पूणमत: " सतनाम धमम " के अनुयायी थे , सतनाम ववचारधारा के पोषक और प्रसारक बहूंत से महापुरूष हुए ष्जन्होंने समय समय पर सतनाम की मदहमा का गुणगान ककया ष्जसमें से प्रमुख महापुरूष इस प्रकार से हैं संत जगजीवन दास जी , गुरू नानक देव जी, गुरू रववदास जी, संत कबीर दास जी, संत पलिू दास जी, संत गररब दास जी ! सतनामीयों व सतनामधमीयों के इततहास में सतनामी राजा बबरभान व जोगीदास दो भाईयों ने 1672 में ववरोह ककया ष्जसका वणमन करते हैं ष्जन्होंने सतनाम धमम व साध सतनामी का समुचे हररयाणा में अलख जगाया था ! बबरभान ददल्ली के तनकि पूवी पंजाब में नारनौल के पास बृजसार के रहने वाले थे उन्होंनें एक पोथी भी मलखी थी, ष्जसका महत्व मसखों के गुरूग्रंथ साहेब के समान था और जो सभी सतनाममयों के मलये पूज्य थी ! तथा हररयाणा के नारनौल में इततहास ने सतनामीयों के मलए अपने आप को किर दौहराया आयों के आक्रमण से हतास सत्यवंशी मसंधुघािी त्याग कर नारनौल आये थे , अब यहां मुगल बादशाह औरंगजेब कक क्रुरता बढ़ने लगी थी ये लोगों से लगान व जष्जया कर के रूप में लोगों को अधधक प्रताणणत करते थे ष्जसके ववरोध में सतनामीयों ने ववरोह ककया जो कक इततहास में " सतनामी ववरोह " के नाम से अंककत है ष्जसे 1672 के सतनामी ववरोह के नाम से भी जाना जाता है ! इततहासकार इमलयि और डावसन(1849) के अनुसार :- यह ववरोह इतना ववशाल था कक इमलयि और डावसन ने उसकी तुलना महाभारत से की है | हररयाणा की धरती पर यह सचमुच का दूसरा महाभारत था , सतनामीयों के ववरोह को कुचलने में दहंदू राजाओं और मुगल सरदारों ने बादशाह का साथ ददया , क्योंकक सतनामी अगर उस ववरोह में ववजयी होते तो समूचे हररयाणा में सतनामीयों का अधधपत्य होता और मुगल बादशाह व दहंदू शासकों का शासन वहां खत्म हो जाता ! ष्जस कारण से औरंगजेब और दहंदू राजाओं के गठबंधन व शाष्जस के तहत सतनाममयों को परास्त ककया गया ! दहंदू और मुष्स्लम शासकों से दोनो ओर से तघर कर सतनामी योध्दाओं को हार मानना पड़ा तथा सतनाम संस्कृतत व सभ्यता की रक्षा के मलए सतनामीयों ने तनणमय मलया कक अब हमें इस भूमम का त्याग करना पड़ेगा और उन सड़यंत्रकाररयों से ववरतापूवमक युध्द में परास्त होने के बाद उस भूमम को त्याग ददए तथा उस महाभारत जैसी युध्द में ष्जतने भी सतनामी बचे वे भारत के कई दहस्सों में ववभक्त हो गये , ष्जसमें से सतनाममयों का एक भाग सतनाम संस्कृतत को समेिे हुए मध्यभारत की भूमम (महाकौंशल) छत्तीसगढ़ आये ! जहां सतनामीयों ने अपना तनवास स्थान सूतनश्चत कर तनवास ककए , कुछ समय अंत्तरामल के बाद 1756 ई. में गुरू घासीदास जी का जन्म हुआ , ष्जन्होंने सतनाम धमम और सतनामी संस्कृतत जो कक लोगों से ववस्मृत होती जा रही थी उस सत्य का शोध कर सतनाम ववचारधारा व ष्जवनशैली को व " सतनाम धमम " का पुन:शंखनाद ककए एक नये ररतत और तनतत के रूप में लोगों के समक्ष रखे ष्जससे समुचे छत्तीसगढ़ में सतनाम का गुंजायमान हो गया तथा यह क्षेत्र सतनाममय हो गया तथा गुरू घासीदास के नवीन व पररशुध्द शोधधत मसध्दांतों को ष्जसने भी ग्रहण ककया वे आज समुचे छत्तीसगढ़ में सतनामी के नाम से जाने जाते हैं | गुरू घासीदास जी के सात मसध्दांत इस प्रकार से हैं:- १. सतनाम पर ववश्वास रखना ! २. मुततम पूजा तनशेध है ! ३. मांसाहार एवं जीव हत्या तनशेध है ! ४. नशा सेवन मत करो ! ५. व्यमभचार मत करो ! ६. चोरी जुआ से दूर रहो ! ७. सभी जीवों से प्रेम करो ! इस प्रकार से गुरू घांसीदास जी के सात मसध्दांतों और उनके कई उपदेश जैसे मानव-मानव एक समान, जातत पातत के प्रपंच में मत पड़ो,सत्य ही मानव का आभूषण है इन महान संदेशों और सद्भावना ने लोगों के मन में मानवतावादी अमीि छाप छोड़ी | गुरू घासीदास जी ने 1850 ई.तक अपने जीवन काल तक सतनाम आंदोलन को जारी रखा ष्जससे समस्त मानव समाज में आई ववकृततयों का नाश हुआ , गुरू घासीदास द्वारा चलाये जा रहे सतनाम आंदोलन को समुचे छत्तीसगढ़ में िैलाने का बहूंत बड़ा श्रेय उनके द्ववततय पुत्र गुरू बालकदास जी को जाता है ,ष्जनका जन्म 1805 ई.को माना जाता है ष्जन्होंने अपने जीवन पयंत तक सतनाम आंदोलन को सूचारू रखे , समाज में राविी प्रथा के साथ रामत कर जन जन तक सतनाम के संदेश और तनततयों तथा रीततयों को िैलाये ष्जनके प्रयास से छत्तीगढ़ में समता का राज्य कायम हो गया था , इन्होंने मानव समाज को संगदठत व सशक्त बनाने के मलए समाज में अखाड़ा प्रथा प्रारंभ ककए ष्जसमें 14 वषम से बालकों को अस्त्र,शस्त्र का प्रमशक्षण ददया जाता था कहीं कहीं पर बामलकाओं को भी इस कला में तनपूणम ककया जाता था इनके अथक प्रयासों से सतनामी एकता व शष्क्त का शौयम का गुणगान अंग्रेजी शासन तक जा पहूंचा अंग्रेजी शासन ने इनको समाज सतनाम जागृतत लाने व समानता के मलए,मशक्षा के मलए ककए गयें कायों का अवलोकन कर 1840 ई. में गुरू बालकदास जी को राजा की उपाधध से नवाजे , अंग्रेजी शासन ने गुरू बालक दास को राजा की पदवी , सोने की मुठ वाली तलवार और हांथी तथा साज सेना से सम्मातनत ककए , तथा मानव समाज में मानवता और प्रेम का अलख जगाते हुए व सतनाम आंदोलन को चरम तक ले जाते हुए ष्जससे समाज में व्याप्त जातत पातत का कलंख ममि सके और सभी समानता भरा जीवन जी सकें सतनाम जागृतत सतनाम आंदोलन चलाते हुए 1860 में इन्हे मानव समाज के खाततर वीरगतत प्राप्त हुआ, गुरू बालक दास जी के शहादत को कोई

भी नही भूल सकता वे सतनाम धमम के वीर मसपाही व शुरववर सतनामी राजा थे ! सतनाम धमम से जलने वाले सड़यंत्रकाररयों नें सड़यंत्रवश उनकी हत्या करवाई ष्जसमें लोकदमनकारी धमम के अग्रणी लोग सष्म्ममलत थे व लोकदमनकारी सामंत वगम साथ था ! गुरू बालक दास जी की हत्या का मुख्य कारण ये था कक वे सतनाम धमम का प्रचार कर रहे थे ष्जससे छत्तीसगढ़ के पुरे दममत व शोवषत वगम उनके साथ कंधे से कंधा ममलाकर चल रहे थे , दमनकारीयों की आंख में ये खिक रहा था | 1857 में एक गदर हुआ ष्जसमें अंग्रेजी शासन से जममदारों व सामंतों तथा राजाओं का जमीनों की मामलक मकबुजा कानून बनने के मलए छत्तीसगढ़ में सबसे पहले गुरू बालकदास जी ने प्रतततनधधत्व ककया , जो कक अन्य राज्यों में किर वही कानून की घिना 1857 की क्रांवत्त का कारण बना ष्जसे 1857 की स्वतंत्रता आंदोलन के नाम से जाना जाता है, 1820-1860 ई. में सतनाम आंदोलन अपने चरम पर रहा ष्जसमें दहंदू धमम के बहूंत से जाततयों ने सतनाम धमम धारण ककए , ष्जस सतनाम आंदोलन का मुख्य उध्देश्य वगम ववदहन, जाततववदहन , मानवतावादी मानव समाज की रचना करना था ष्जसमें सभी मानवों को समानता का अधधकार ददलाना एक लक्ष्य था , ष्जस उध्देश्य की प्राष्प्त होती जा रही थी सवमसमाज ममलकर सतनाम आंदोलन में कुद पड़े थे लेककन सामंतों और लोकदमनकारीयों को ये रास नही आ रहा था , तथा बिदिस सरकार सतनाममयों को इसाई बनाना चाहते थे और दहंदू चाहते थे सतनाम धमम दहंदू धमम का पंथ बनने ष्जसके मलए दोनो तरि से लाखो सड़यंत्र हुए , पुरे छत्तीसगढ़ में पेशवा-मराठों का आतंक रहा ष्जससे लड़ते हुए सतनाम आंदोलन जारी ष्जसमें हमारे हजारों पूवमजों ने ववरतापूवमगक सभी से लड़ते गये तथा सतनामी को इसाई बनाना और दहंदू धमम का पंथ बताना आज के वतममान ष्स्थतत में भी जारी है तथा सतनाममयों को अन्यधमम वाले भी अपने धमम में सष्म्ममलत करने के साष्जस में लगे हुए है| गुरू घासीदास और गुरू बालक दास ने सतनाम धमम का प्रचार ककया ककसी पंथ का प्रचार नही ककया था , ये तो सामंतों और िाम्हणों की कुितनतत थी , सड़यंत्र के तहत सतनाम धमम को दहंदू धमम के एक पंथ के रूप में सत्यावपत करने पर पुरा छल कपि का सहारा मलये और 1911 में इसे दहंदू धमम में ववलय ककया गया, तथा कुछ समयान्तरामल के बाद 27 जनवरी 1926 को सतनामी महासभा ,छत्तीसगढ़ क्षेत्र के अध्यक्ष माननीय श्री रततराम मालगुजार की अगुवाई में एक संयुक्त नयापन मध्यप्रदेश एवं बरार के राज्यपाल सर माण्िेनयू बिलर को बबलासपुर में सौंपा ष्जसमें सतनामीयों की समस्त परेशातनयों को अंग्रेजी हुकूमत के सामने रखा गया, ष्जसमें मुख्य कारण ये था सतनामी को मसिम सतनामी कहा जाये क्योंकक दहंदू धमम के लोग बराबर के व िक्कर देने वाली मानवतावादी धमम को आगे बढ़ते देख सतनामी ककसी के सामने झुकते नही थे ष्जस कारण लोग सतनामी को सतनामी न कहकर बहूंत ही घृणणत नाम से पुकारना प्रारंभ कर दीए थे और इसी तरह अपमातनत ककया जाता था | ष्जसको देखने के बाद सोंच समझकर अंग्रेजी हुकूमत ने ददनांक 7 अक्िूबर 1926 को आदेश जारी ककया की सतनाममयों को मसिम सतनामी कहा जाये तथा अन्य क्षेत्रों में भी समानता का अधधकार प्रदान ककए जैसे मशक्षा, सरकारी नौकरी ,राजतनतत इत्यादद, तथा भारत स्वतंत्र होने के पश्चात् सन् 1950 में आरक्षण ववधेयक आया ष्जसमें सतनाममयों को आरक्षण का लाभ ददलाने तथा सतनामीयों के उन्नतत के मलए गुरू वंशज गुरू अगमदास जी नें आरक्षण ववधेयक में हस्ताक्षर कर ददया एक तरि तो सतनामीयों को सरकारी योजनाओं का लाभ ममलना सुतनश्चत हो गया परंतु वही अब सतनामी जो कक जातत नही थी उस पर जातत का ठप्पा लग गया और जातत के 14 नम्बर कॉलम में अंककत हो गया ,इसी तरह सतनामी अब जातत में पररणणत कर दीए और सतनाम जो कक धमम है उसे पंथ कहा जाने लगा , जबकक सतनामी एक सवमभौममक नाम है ष्जसे कोई भी धारण कर सकता है सतनाम धमम व सत्य को आचरण में लाकर , सतनाम धमम को " मानव धमम " के नाम से भी जाना जाता है ष्जसका मुख्य आधार मानव मानव एक समान का संदेश व सभी जीवों से प्रेम करो का संदेश है ! मानवाधधकार-स्वामभमान डोला प्रथा:- 1883 ई.में राजमहंत श्री भुजबलदास साहेब व साहेब बखररया भंडारी की अगुवाई में मानवाधधकार डोला प्रथा की लड़ाई लड़ी गई , क्रुर लोकदमनकारी सामंत्तों से ष्जस प्रथा का आरंभ साहेब भुजबल जी ने अपने सुपुत्र की शादी में अपनी बहू को डोला में लाकर सामंत साहों का मसर तनचे ककए, यह उस समय की बात है जब सामंत साहों की क्रुरता चरम पर थी सामान्य लोगों को मानवीय गररमानुरूप घोड़ा, डोला सवारी, साि स्वच्छ हार , घर द्वार , वस्त्र, अस्त्र, शस्त्र , पगड़ी, पनही आदद का प्रयोग वष्जमत कर रखे थे | सन् 1914-1924 ई. तक पुरे छत्तीगढ़ में एक सशक्त आंदोलन चलाया गया ष्जसमें गौ वध को रोका गया ष्जसके अगुवाई में थे गुरू अगमदास जी, राजमहंत नैनदास जी , राजमहंत अंजोर दास जी , महंत ववशालदास जी , महंत िुलदास जी एवं मालगुजार रततराम जी थे | सतनामी एकता के सामथमय के तहत बलौदाबाजार के करमनडीह व ढ़ाबाडीह के बूचड़ खानों को तोड़ डाले गये व कसाईखाना बंद कर ददया गया | 1930 के स्वाधधनता संग्राम में मुंगेली तहसील के सतनाममयों ने ववदेशी शराब दुकानों पर धरना प्रदशमन ककया , इतना ही नही सकनामीयों ने राटरीय धारा से जुड़ते हुए सन् 1923, सन् 1930, सन् 1932 एवं सन् 1941-42 के स्वाधधनता आंदोलन में भाग लेकर सतनामी एकता का पररचय कराये थे ! धमम और पंथ दोनो बबल्कुल अलग है , और दोनो को एक समान समझना बहूंत बड़ी भूल है पंथ और धमम में महत्वपूणम बबन्दूओं के आधार पर अन्तर :- 1. पंथ का कोई न कोई संस्थापक होता है, जो कक एक मनुटय होता है | नोि:- " सतनाम धमम " सृष्टि की उत्पवत्त व ववकास से जुड़ा है, सतनाम ववचारधारा गुरू घासीदास के जन्म से पहले से है ! सतनामी एक जीवनशैली है ष्जसके प्रचारक के रूप में कई महा पुरूषों ने योगदान ददया और गुरू घांसीदास जी ने पंथ का तनमामण नही ककया था वो तो सत्य का शोध कर सतनाम धमम के प्रचार ककए थे , और समुचे छत्तीसगढ़ को सतनाम धमी बनाये थे ! 2. पंथ ककसी वगम ववशेष के प्रबंधन के मलए बनाया जाता है ! नोि:- सतनाम को पंथ कहने वाले ये अच्छी तरह से जानते हैं सतनाम को धारण करने वालों को ककस प्रकार से जातत के बंधन में बांध कर पंथ का नाम ददया गया है , जबकक सतनामी कोई जातत नही है , यह एक सवमभौममक नाम है ष्जसे कोई भी धारण कर सकता है मानवता और सत्य को आचरण में लाकर , पंथ ककसी वगम ववशेष के प्रबंधन के मलए तैयार ककया गया होता है जबकक सतनाम या सतनामी में समस्त जीव जगत व सृष्टि को समानता की बात कही गई है सभी जीवों से प्रेम का संदेश ददया गया है ! छत्तीसगढ़ में राऊत, तेली, कुरमी, गाड़ा , घसीया इत्यादद समाज जो कक दहंदू धमम की जातत व पंथ है ष्जन्होंने सतनाममयत ष्स्वकार कर सतनाम धमम के प्रचार में अपना महत्वपूणम योगदान ददए हैं सतनाम धमम समस्त जीवों के साथ ही मानव मानव एक समान अथामत समस्त मानव समाज की समानता पूवमक प्रबंधन की बात करता है , अत: सतनाम पंथ नही धमम है ! 3. पंथ में लोगों की मानमसकता संकीणम होती है , वे एक दूसरे को छोिा बड़ा कहने लगते हैं !

नोि:- सतनाम धमम में कोई ऊंच तनच व जातत पातत का भाव नही होता ये सवम ववददत है सतनाम धमी ककसी को छोिा बड़ा नही मानते अत: सतनाम पंथ नही धमम है ष्जसका उध्देश्य व कत्तमव्य मसममत नही वृहद है ! 4. पंथ कट्िरवादी प्रवृवत्त के होते हैं , तथा अपने समाज को श्रेटठ साबबत करने में तुले रहते हैं ! नोि:- सतनाम धमम में कट्िरतावादी तनतत नही है यह अपने आप को श्रेटठ साबबत करनें में जरा भी नही तुला रहता, जबकक सतनाम धमम के अनुयायी सतनामी सभी समाज व धमम को सम्मान की दृष्टि से देखता है चाहे वह कोई भी धमम हो जैसे दहंदू, मुष्स्लम,इसाई, मसक्ख, बौध्द, जैन इत्यादद इन सभी धमामवलष्म्बयों को सतनाम धमम के अनुयायी समानता की दृष्टि से देखता है , इन सब की अपनी अपनी अलग अलग अष्स्मता है ष्जसका " सतनाम धमम " सम्मान करता है तथा सभी धमों के धमामवंलम्बीयों द्वारा सतनाम धमम के अपनी अलग अष्स्मता का सम्मान करें हम सतनाम धमी यही चाहते हैं , अत: सतनाम पंथ नही धमम है | सतनाम धमम के महत्वपूणम लक्षण:- सत्य, बुष्ध्द, नयान प्राष्प्त, इंदरय नयान , शुध्दता, अदहंसा, आत्म संयम, धैयम, क्षमा, अक्रोध , चोरी न करना, अध्यात्म और ववनयान का अनुपम संयोग इत्यादद ! दहंदू धमम से अलग सतनाम धमम की रीतत और तनतत ष्जससे सतनामी जीवन शैली दहंदू धमम से कोषों दूर है :- १.सतनाम धमम में अमभवादन के रूप में सतनाम कहने पर सामने वाला जय सतनाम कहता है, जबकक दहंदू धमी जय श्रीराम व जय श्रीकृटण कहते हैं .. नोि:- अगर सतनामी दहंदू धमम का पंथ होता तो ककसी सतनामी द्वारा सतनाम के अमभवादन करने पर दहंदू द्वारा जय सतनाम जवाब में देते लेककन यैसा नही होता वो मसिम जय श्रीराम ही कहते हैं तथा सतनाम या जय सतनाम कहने में दहचकते हैं या कहना नही चाहते , अत: सतनामी दहंदू से अलग सतनाम धमम के अनुयायी है ! २. जन्म संस्कार, वववाह संस्कार, मृत्यु संस्कार, गृहप्रवेश तथा अन्य सांस्कृततक कायमक्रम जहां दहंदू लोग जो कक अपना गुरू िाम्हण को मानते हैं उनसे इन सभी कायों को सम्पन्न कराने के मलए पुजा पाठ कराते हैं ष्जसमें रामायण, भगवतगीता, देववभागवत, सत्यनारायण कथा इत्यादद का पाठ करवाते हैं , जबकक सतनामी और सतनाम धमम के अनुयायी इन सब से कोषो दूर है | जन्म संस्कार, वववाह संस्कार, मृत्यु संस्कार इत्यादद में पुजा पाठ के मलए िाम्हण को नही बुलाते तथा और अपने सभी सांस्कृततक कायों में गॉव के भंडारी और सािीदार तथा समस्त ग्राममण ममलकर सम्पन्न करते हैं | ३. दहंदू धमम के समस्त जातत समाज और पंथ के लोग िाम्हणों को अपना गुरू मानते हैं और उनका श्रेटठ गुरू शंकराचायम होते हैं , जबकक सतनाम धमम के अनुयायी िाम्हणों को अपना गुरू नही मानते व सतनामी के गुरू गुरू घासीदास जी व उनके वंशज हैं अत: सतनाम धमम दहंदू धमम का कोई पंथ नही यह स्वतंत्र धमम है | ४. दहंदू धमम में मुततम पुजा तथा मंददर तनमामण पर उनकी पुजा वो ककसी न ककसी िाम्हण पंडडत से कराते हैं , जबकक सतनाम धमम में गुरू सेवा, गुरू गद्दी सेवा व जैतखाम सेवा की परम्परा है और सेवा कायों में िाम्होणों को नही बुलाया जाता , अत: सतनाम धमम है दहंदू धमम का पंथ नही है | ५. दहंदू धमम को ववमभन्न जातत व समाज तथा पंथ में ववभाष्जत ककया गया है जबकक सतनाम धमम में सतनाम को धारण करने वालों व सतनामी जीवनशैली को अपनाने वालों को मसिम सतनामी ही नाम ददया गया है . कोई जाततगत छोिा बड़ा नही सभी को एक सवमभौममक सतनामी नाम ददया गया है. @- कई लोग व दहंदू धमम के अनुयायी सतनामीयों को यह तकम देते हैं कक सतनाम दहंदू धमम का एक पंथ है, क्यों ? ये पुछने पर उनका जवाब रहता है सतनामी लोग दहंदू धमम के सभी त्यौहारों को मानाते हैं व बहूंत कुछ दहंदू संस्कारों में चलते हैं , मैं उन सभी भाईयों से यही कहूंगा कक सतनाम धमम को दहंदू धमम के बहूंत सी जाततयों ने ग्रहण ककया है और वो आज सतनामी कहलाते है तथा उनका दहंदू धमम के प्रतत लगाव खत्म नही हुआ है वो उस धमम को भी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं तथा हम ष्जस धमम के करीब में ज्यादा रहते हैं उस धमम के प्रतत सम्मान रखना या सम्मान आना स्वभाववक बात है , तथा आपके जानकारी के मलए कहना चाहूंगा सतनाम धमम कट्िरतावादी नही है सतनाम धमम के अनुयायी दहंदू धमम के साथ साथ अन्य धमों का और उनके अनुयायीयों का सम्मान करता है और करता रहेगा इससे हम सतनाम धमम को धारण करने वाले सतनामी कभी भी दहंदू धमम के पंथ नहीं हैं , तथा दहंदू धमम भारत में आयों के आगमन से ववस्तार हुआ जबकक सतनाम धमम आयों के आगमन के 15 हजार वषों पूवम का मानव धमम है अथामत सतनाम धमम है , ष्जस प्रकार दहंदू धमम के अनुयायी दहंदू धमामवलम्बी कहलायें , मुष्स्लम धमामवलम्बी मुष्स्लम कहलायें , इसाई धमामवलम्बी इसाई कहलायें, मसख धमामवलम्बी मसख कहलायें , बौध्द धमम के अनुयायी बौध्द कहायें व जैन धमम के लोग जैन कहलायें ये उनकी संववधातनक अधधकार है तथा हम सतनाम धमम को धारण करने वालों को सतनाम धमामवलम्बी ही कहा जाये हमारें सतनाम धमम को दहंदू धमम के पंथ के रूप में प्रसाररत न ककया जाये हम आप सभी के इन धमों का सम्मान करते हैं हमें भी आप सभी धमामवलम्बीयों से ये अपेक्षा है कक आप हमारे सतनाम धमम का सम्मान करें और हमें सतनाम धमी कहें न कक दहंदू धमम का पंथ , सतनाम पंथ नही धमम है !!@ # इस सृष्टि में सतनाम के उपासक कौन नही है # $ गुरू घासीदास जी को गुरू कौन नही मानते $ जय सतनाम जय सतनाम जय सतनाम !!! सतनाम धमम अमर रहे !!! !!! सतनाम धमम की जय !!! आपको उधचत लगे तो सतनाम धमम की कानूनी मान्यता के मलए इस मेसेज को अपने कररबबयों में से 10 लोगों को शेयर करें....ष्जससे कुछ लोग तो जागेंगे , मेसेज पढ़ने वाले का भी जय, मेसेज सेंड करने वाले का भी जय , इस मेसेज को आगे दस लोगों को सेंड करने वाले का भी जय , तथा सतनाम धमम और गुरूघासीदास जी व राजा गुरू बालकदास जी की जय.. @@@@@@@@@@@@@

  1. 1.0 1.1 https://www.google.co.in/search?q=satnam+jaitkham&rlz=1C1GIWA_enIN785IN806&tbm=isch&tbo=u&source=univ&sa=X&ved=2ahUKEwipmffXp9zeAhXBr48KHSZCBKIQ7Al6BAgFEA8&biw=1366&bih=608#imgrc=y71aMm2FiUh0QM: